Sunday, August 13, 2017

विज्ञान की अमर विभूति सर जगदीश चंद्र बसु

पेङ पौधौं से संबन्धित सवालों की जिज्ञासा बचपन से लिए, धार्मिक वातावरण में पले, जिज्ञासु जगदीश चंद्र बसु का जन्म 30 नवंबर, 1858 को बिक्रमपुर हुआ था, जो अब ढाका , बांग्लादेश का हिस्सा था । आपके पिता श्री भगवान सिंह बसु डिप्टी कलेक्टर थे।
उस दौर में अफसर लोग अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में ही पढाकर अफसर बनाना चाहते थे। परन्तु पिता श्री भगवान सिंह बसु अपने बेटे को अफसर नही बल्की सच्चा देश सेवक बनाना चाहते थे। इसलिए जगदीशचंद्र बसु को पास के स्कूल में दाखिला दिला दिया गया, वहाँ अधिकतर किसानों और मछुवारों के बच्चे पढते थे। वे पढाई भी करते थे, साथ-साथ खेती और दूसरे कामों में अपने घर वालों का हाँथ भी बँटाते थे। उन बच्चों के साथ रहकर बसु ने जीवन की वास्तविक शिक्षा को अपनाया। वहीं उन्हे शारीरिक श्रम करने की प्रेरणा मिली। सबको समान समझने की भावना पैदा हुई, मातृभाषा से प्रेम भी हो गया।
पेङ-पौधों के बारे में जब उनके सवालों का उत्तर बचपन में स्पष्ट नही मिला तो वे बङे होने पर उनकी खोज में लग गये। बचपन के प्रश्न जैसेः- माँ पेङ के पत्ते तोङने से क्यों रोकती थी? रात को उनके नीचे जाने से क्यों रोकती थी? अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण आगे चलकर उन्होंने अपनी खोजों से पूरे संसार को चकित कर दिया।
लंदन से रसायन शास्त्र और वनस्पति शास्त्र में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात भारत वापस आ गये। कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी विज्ञान के अध्यापक बने। कॉलेज में उस समय अधिकतर अंग्रेज शिक्षक ही थे। प्रिंसीपल भी अंग्रेज थे। वहाँ भारतियों के साथ भेदभाव बरता जाता था। समान कार्य हेतु अंग्रेजों के मुकाबले भारतीयों को कम वेतन दिया जाता था। बचपन से ही उन्होने अपने देश और जाति के स्वाभिमान को समझा था अतः उन्होने इस अन्याय का डटकर सामना किया। भारतियों को कम वेतन देने का कारण ये भी था कि उन्हे विज्ञान की पढाई के योग्य नही समझा जाता था।
जगदीश चंद्र बसु के विरोध जताने पर वहाँ के प्रिंसिपल ने उनका वेतन और कम कर दिया, जिसे बसु ने लेने से इंकार कर दिया। बगैर वेतन के वे अपना काम करते रहे। आर्थिक तंगी के कारण उन्हे अनेक परेशानियों का सामना करना पङा किन्तु वे धैर्य के साथ अपनी बात पर अङे रहे। परिणाम स्वरूप उन्हे उनके स्वाभीमान का उचित फल मिला। उनकी ढृणता के आगे कॉलेज वालों को झुकना पङा। वे अन्य भारतियों को भी पूरा वेतन देने को तैयार हो गये। जगदीशचंद्र बसु की नौकरी भी पक्की कर दी गई तथा उनका बकाया वेतन भी उन्हे मिल गया।
बसु पढाने के बाद अपना शेष समय वैज्ञानिक प्रयोग में लगाते थे। उन्होने ऐसे यंत्रो का आविष्कार किया जिससे बिना तार के संदेश भेजा जा सकता था। उनके इसी प्रयोग के आधार पर आज के रेडियो काम करते हैं। जगदीशचंद्र बसु ही बेतार के तार के वास्तविक आविष्कारक हैं परंतु परिस्थिति वश इसका श्रेय उन्हे नही मिल सका।
बसु हार मानने वाले इंसान नही थे, उन्होने पेङ-पौधों पर अध्यन करना शुरु किया वैसे भी इसमें तो उनकी बचपन से जिज्ञासा थी। पेङ-पौधों पर की गई खोज उनके लिए वरदान सिद्ध हुई। उनकी खोज ने ये सिद्ध कर दिया कि पौधे भी सजीवों के समान सांस लेते हैं, सोते जागते हैं और उन पर भी सुख-दुख का असर होता है। उन्होने ऐसा यंत्र बनाया, जिससे पेङ-पौधों की गति अपने आप लिखी जाती थी।इस यंत्र को क्रेस्कोग्राफ (crescograph) कहा जाता है । लंदन स्थित रॉयल सोसाइटी ने उनके आविष्कार को एक अद्भुत खोज कहा और उन्हे रॉयल सोसाइटी का सदस्य भी मनोनित कर लिया।
इसी खोज को प्रदर्शित करते समय उनके साथ बहुत ही मजेदार घटना घटी। पेरिस में उन्हे पौधों पर तरह-तरह के जहरों का असर दिखाना था। उन्होने एक पौधे पर पोटेशीयम साइनाइड का प्रयोग किया किन्तु पौधा मुरझाने की बजाय और अधिक खिल उठा। पोटेशिय साइनाइड बहुत तेज किस्म का जहर होता है। उसका पौधे पर उलटा असर देख कर उन्हे बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होने उसे चखा तो वो चीनी थी। वहीं वो कैमिस्ट भी था जिससे पोटेशियम साइनाइड उन्होने मँगाया था। कैमिस्ट ने कहा कि “कल मेरे पास एक नौकर पोटेशियम साइनाइड लेने आया था, मैने सोचा कहीं ये आत्महत्या न कर ले अतः मैने इसे चीनी का पाउडर दे दिया था।“
जगदीशचंद्र बसु निरंतर नई खोज करते रहे, 1915 में उन्होने कॉलेज से अवकाश लेकर लगभग दो साल बाद “बोस इन्स्ट्यूट” की स्थापना की। जो ‘बोस विज्ञान मंदिर’ के नाम से प्रख्यात है। 1917 में सरकार ने उन्हे सर की उपाधी से सम्मानित किया।
सर जगदीश चंद्र बसु केवल महान वैज्ञानिक ही नही थे, वे बंगला भाषा के अच्छे लेखक और कुशल वक्ता भी थे। विज्ञान तो उनके सांसो में बसता था। 23 नवंबर, 1937 को विज्ञान की ये विभूति इह लोक छोङ कर परलोक सीधार गई। आज भी वैज्ञानिक जगत में भारत का गौरव बढाने वाले सर जगदीसचन्द्र बसु का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ है। ऐसी विभूतियाँ सदैव अमर रहती हैं।

इंदिरा गाँधी

इंदिरा गाँधी जी का जनम 19 नवंबर 1917 को इलाहाबाद में आनंद भवन में एक ऐसी महान विभूती का जन्म हुआ जिसने न केवल भारतीय राजनीति को नये आयाम दिये बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी एक युग बनकर छाई रहीं।
रवीन्द्रनाथ टैगोर की “प्रियदर्शिनी”, नेहरु की इंदिरा, मोरार जी देसाई की गुंगी गुङिया, दृढ़निश्चयी और किसी भी तरह की परिस्थिति से जूझने और जीतने की क्षमता रखने वाली शक्तीशाली महिला श्रीमति इंदिरा गाँधी भारत की पहली एवं अब तक की एक मात्र महिला प्रधानमंत्री हैं।
अपने दृढ निश्चय, साहस और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता के कारण इंदिरा गांधी को विश्व राजनीति में लौह महिला के रूप में जाना जाता है लेकिन बचपन में उन्हें भी आम बच्चों की तरह अंधेरे से काफी डर लगता था।
“इंदिरा गांधी ने अपने संस्मरण ‘बचपन के दिन’ में इसका उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि मुझे अंधेरे से डर लगता था, जैसा कि शायद प्रत्येक छोटे बच्चे को लगता है। रोज शाम को अकेले ही निचली मंजिल के खाने के कमरे से उपरी मंजिल के शयनकक्ष तक की यात्रा मुझे बहुत भयभीत करती थी। लम्बे, फैले हुए बरामदे को पार करना, चरमराती हुई लकड़ी की सीढ़ियोंपर चढ़ना और एक स्टूल पर चढ़कर दरवाजे के हैंडिल और बत्ती के स्विच तक पहुंचना, किन्तु साहस के महत्व का ऐसा ज़जबा था कि मैंने निश्चय किया कि मुझे इस भय से स्वयं ही छुटकारा पाना है।“
आज़ादी के आन्दोलनों का नन्ही इन्दिरा के दिल पर अमिट प्रभाव रहा और 13 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने युवा लड़के-लड़कियों के लिए वानर सेना बनाई, जिसने विरोध प्रदर्शन और झंडा जुलूस के साथ साथ कांगेस के नेताओं की मदद में संवेदनशील प्रकाशनों तथा प्रतिबंधित सामग्रीओं का परिसंचरण कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में छोटी लेकिन उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी।
पाकिस्तान के साथ 1971 में हुए संग्राम में उन्होंने बांग्लादेश नाम से एक नए देश के गठन में सक्रिय भूमिका निभाई जिससे वह पूरी दुनिया में दृढ़ इरादों वाली महिला के रूप में जानी जाने लगीं और अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें दुर्गा की संज्ञा दी। अपने साहसिक फैसलों के लिए मशहूर इंदिरा गांधी ने 1974 में पोखरण में परमाणु विस्फोट कर जहां चीन की सैन्य शक्ति को चुनौती दी, वहीं अमेरिका जैसे देशों की नाराजगी की कोई परवाह नहीं की। इन निर्णयों के चलते जहां उन्हें देश और दुनिया में बुलंद इरादों वाली महिला के रूप में तारीफ मिली, वहीं 1975 में आपातकाल लगा देने के कारण इंदिरा को विश्व बिरादरी की आलोचना का भी सामना करना पड़ा।
पंजाब में सिक्ख आतंकवादियों ने स्वायत्त राज्य की माँग पर ज़ोर देने के लिए हिंसा का रास्ता अपना लिया। जवाब में श्रीमती गांधी ने जून 1984 में सिक्खों के पवित्रतम धर्मस्थल अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर पर सेना के हमले के आदेश दिए, जिसके फलस्वरूप 450 से अधिक सिक्खों की मृत्यु हो गई। स्वर्ण मन्दिर पर हमले के प्रतिकार में पाँच महीने के बाद ही श्रीमती गांधी के आवास पर तैनात उनके दो सिक्ख अंगरक्षकों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।
करोड़ों लोगों की प्रिय प्रधानमंत्री का जीवन-इतिहास उपलब्धियों से भरा पड़ा है। दृढ़ इरादों और सटीक फैसलों वाली इंदिरा गांधी ने अपनी क्रांतिकारी सोच और अद्भुत प्रशासनिक क्षमता से विश्व में भारत को गौरवशाली राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।
श्रीमति इंदिरा गांधी के जन्मदिवस पर निम्न पंक्तियों से अभिन्नदन करते हैं
“खुद अपने आपमें सिमटी हुई सदी हैं ये,
भारत रत्न से अलंकृत सबकी प्रियदर्शनी हैं ये,

कैसे जलाये रखें अपने अन्दर की चिंगारी को?

इस चिंगारी कि शुरआत कहाँ से होती है?
मुझे लगता है हम इसके साथ पैदा होते हैं. मेरे 3 साल के जुड़वाँ बच्चों में million sparks हैं. वो Spider-man का एक छोटा सा खिलौना देख के बिस्तर से कूद पड़ते हैं. Park में झूला झूल के वो thrilled हो जाते हैं. पापा से एक कहानी सुनके उनमे उत्तेजना भर जाती है. अपना Birthday आने के महीनो पहले से वो उलटी गिनती करना शुरू कर देते हैं कि उस दिन cake काटने को मिलेगा.
मैं आप जैसे students को देखता हूँ और मुझे आपके अन्दर भी कुछ spark नज़र आता है. पर जब मैं और बड़े लोगों को देखता हूँ तो वो मुश्किल से ही नज़र आता है. इसका मतलब, जैसे -जैसे हमारी उम्र बढती है, spark कम होते जाते हैं. ऐसे लोग जिनमे ये चिंगारी बिलकुल ही ख़तम हो जाती है वो मायूस, लक्ष्यरहित और कड़वे हो जाते हैं. Jab We met के पहले half की करीना और दुसरे half की Kareena याद है ना? चिंगारी बुझ जाने पे यही होता है.
तो भला इस Spark को बचाएँ कैसे?
Spark को दिए की लौ की तरह imagine कीजिये. सबसे पहले उसे nurture करने की ज़रुरत है उसे लगातार इंधन देने की ज़रुरत है. दूसरा, उसे आंधी-तूफ़ान से बचाने की ज़रुरत है.
Nurture करने के लिए, हमेशा लक्ष्य बनाएं .यह इंसान कि प्रवित्ति होती है कि वह कोशिश करे, सुधार लाये और जो best achieve कर सकता है उसे achieve करे. दरअसल इसी को Success कहते हैं. यह वो है जो आपके लिए संभव है. ये कोई बाहरी माप -दंड नहीं है जैसे company द्वारा दिया गया Package, कोई car या कोई घर.
हममे से ज्यदातर लोग middle-class family से हैं. हमारे लिए, भौतिक सुख -सुविधाएं सफलता की सूचक होती हैं, और सही भी है. जब आप बड़े हो जाते हैं और पैसा रोज़ -मर्रा कि ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज़रूरी हो जाता है, तो ऐसे में financial freedom होना एक बड़ी achievement है.
लेकिन यह ज़िन्दगी का मकसद नहीं है. अगर ऐसा होता तो Mr. Ambani काम पर नहीं जाते. Shah Rukh Khan घर रहते और और -ज्यादा dance नहीं करते. Steve Jobs और भी अच्छा iPhone बनाने के लिए मेहनत नहीं करते, क्योंकि Pixar बेच कर already उन्हें कई billion dollars मिल चुके हैं. वो ऐसा क्यों करते हैं? ऐसा क्या है जो हर रोज़ उन्हें काम पर ले जाता है?
वो ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि ये उन्हें ख़ुशी देता है. वो ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि ये उन्हें जिंदादिली का एहसास करता है. अपने मौजूदा स्तर में सुधार लाना आपको एक अच्छा एहसास दिलाता है. अगर आप मेहनत से पढ़ें तो आप अपनी rank सुधार सकते हैं. अगर आप लोगों से interact करने का प्रयत्न करें तो आप interview में अच्छा करेंगे. अगर आप practice करें तो आपके cricket में सुधार आएगा. शायद आप ये भी जानते हों कि आप अभी Tendulkar नहीं बन सकते, लेकिन आप अगले स्तर पर जा सकते हैं. अगले level पे जाने के लिए प्रयास करना ज़रूरी है.
प्रकृति ने हमें अनेकों genes के संयोग और विभिन्न परिस्थितियों के हिसाब से design किया हैखुश रहने के लिए हमें इसे accept करना होगा, और प्रकृति कि इस design का अधिक से अधिक लाभ उठाना होगा. ऐसा करने में Goals आपकी मदद करेंगे.

कैसे बनेगा हमारा भारत महान?

मित्रों हर स्वतंत्रता दिवस पर हम महात्मा गाँधी, भगत सिंह सहित उन अनगिनत आज़ादी के दीवानों को याद करते हैं जिन्होंने हमें अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया…..आज भी मैं उन्हें नमन करता हूँ और उनके अमर बलिदान के सम्मान में अपना शीश झुकाता हूँ.
पर आज मैं उन वीर सपूतों की कुर्बानियां नहीं गिनाऊंगा… ना ही मैं उनके बलिदानों का लेखा-जोखा दूंगा….बल्कि आज मैं अपने देश के प्रति हमारे योगदान के बारे में बात करना चाहूँगा.
क्या आपने इस देश को महान बनाने के लिए कोई काम किया है या कर रहे हैं?
मैं आपसे एक प्रश्न करना चाहता हूँ…. कोई देश महान कब बनता है?
कोई देश महान तब बनता है जब उस देश के देशवासी महान बनते हैं….क्योंकि देश तो देशवासियों से ही बना होता है.
तो क्या हम सब भारत के वासी महान बन रहे हैं? क्या हम कुछ ऐसा कर रहे हैं जो हमें महान बनाता है? या कहीं हम इसका उल्टा तो नहीं कर रहे….
  • कहीं हम पान खा कर दीवारों पर तो नहीं थूक रहे….
  • कहीं हम अपने घर का कूड़ा सड़कों पर तो नहीं फेंक रहे….
  • कहीं हम कमरों में लाइट और पंखे खुला छोड़ बाहर तो नहीं टहल रहे ….
  • कहीं हम नल खुला छोड़ पानी की बर्बादी तो नहीं कर रहे ….
  • कहीं हम थाली में परोसा खाना छोड़ अन्न का अपमान तो नहीं कर रहे….
अफ़सोस हममें से ज्यादातर लोग ऐसा कर रहे हैं….और ऐसा करने का मतलब है कि हम महान नहीं बन रहे और अगर हम महान नहीं बन रहे तो ये देश कैसे महान बनेगा?
एक बूढ़े दादा जी पार्क में उदास बैठे थे…वहां खेल रहे बच्चों ने पूछा आप उदास क्यों हैं?
दादा जी बोले, “ जब मैं छोटा था तब मैं सोचता था कि एक दिन मैं देश को बदल कर रख दूंगा… जब थोडा बड़ा हुआ तो सोचा….भाई ये देश बदलना अपने बस की बात नहीं मैं तो बस इस शहर को बदल दूंगा…. लेकिन जब कुछ और समय बीता तो लगा ये भी कोई आसान काम नहीं है चलो मैं बस अपने आस-पास के लोगों को बदल दूंगा….
पर  अफ़सोस  मैं  वो  भी  नहीं  कर  पाया .
और  अब  जब  मैं  इस  दुनिया  में  कुछ  दिनों  का  ही  मेहमान  हूँ  तो  मुझे  एहसास  होता  है  कि   बस अगर  मैंने  खुद  को  बदलने  का  सोचा  होता  तो  मैं  ऐसा  ज़रूर  कर  पाता …और  हो   सकता  है  मुझे  देखकर  मेरे आस-पास के लोग भी बदल जाते …और  क्या  पता  उनसे  प्रेरणा  लेकर  ये  शहर भी  कुछ  बदल जाता … और  तब   शायद  मैं  इस  देश  को  भी  बदल  पाता !”
दोस्तों, कोई भी बड़ा बदलाव खुद से शुरू होता है… महात्मा गांधी ने कहा भी है
इसलिए अगर आप “मेरा भारत महान” बनाना चाहते हैं तो पहले खुद महान बनिए…और महान बनने के बीज इन छोटी-छोटी बातों में ही छिपे होते हैं…करने दीजिये दुनिया जो करती है बस अपनी जिम्मेदारी लीजिये बस खुद को बदलने का संकल्प कीजिये—
  • प्रण लीजिये कि आप स्वच्छता रखेंगे….
  • प्रण लीजिये कि आप बिजली बचायेंगे….
  • प्रण लीजिये कि आप पानी का संचय करेंगे…
  • प्रण लीजिये कि आप अन्न का अपमान नहीं करेंगे….
और यकीन जानिये जब आप ऐसा करेंगे तब भारत को सचमुच महान बनने से कोई नहीं रोक पायेगा….और तब हम सब गर्व से कह पायेंगे

Wednesday, August 9, 2017

जीवन में पैसे का महत्व

बहुत से अभिवावक अपने बच्चों को कहते है कि प्यार  के सामने पैसा कुछ नहीं होता । प्यार सबसे बड़ा होता है । वियक्ति का दिल खुला होना चाहिए । पैसे का क्या है ? मैं ऐसे अभिवावकों को चेलेंज करता हूँ कि वो प्यार से घर का राशन खरीद कर दिखाएँ ,बिजली,पानी और फ़ोन का बिल भर कर दिखाए गाड़ी में पेट्रोल भरवा कर दिखाएँ ।जीवन से जुडी बाकी जरूरते पूरी कर के दिखाए ।
अगर हम अपने बच्चों को यह सोच दे रहे है तो उन्हें भविष्य का कंगाल वियक्ति बना रहे है ।समझदार अभिवावक वही है जो बच्चे को जरा सा समझदार होते ही पैसे का महत्व समझाना सुरु कर दे ।जो बच्चों को समझते है कि जीवन में मर्यादाओं ,अनुशाशन व् परिश्रम का अपनी जगह महत्व है ।लकिन जब तक पैसा नहीं होगा जीवन कि गाड़ी नहीं चल सकेगी ।

What Makes a Good Relationship?


Every since we were children, we were taught the simplest lessons to be able to cope with the challenges of life and to be able to build good relationships with others. No man is an island and we need to learn to properly interact and coexist with our peers to be able to strive in the real world. Having good relationships will assure you that you will never have to live your life alone. The question is, what makes a good relationship?

We Share
Once you are in a good relationship, you are not just thinking about yourself. You learn to share what you have. This does not just include material things. You should also share your thoughts, your ideas, your dreams and even your frustrations. You both take turns doing things that you like together. You both learn to compromise and sacrifice some things that you used to just would rather keep all to yourself.
We Care
People in a good relationship are kind to each other. They care about each others stuff and make efforts to show how they value each other’s space. They both take the time to know what matters to the other and also give time to try out each other’s interests. Most of all, they care enough to listen to each other and do nice things for each other.
We Play Fair
A good relationship is a two-way traffic. Each one is allowed to move freely as an individual, but each action is done with consideration of the other one’s feelings. No one is above the other.
We Cooperate
A healthy union is bound by cooperation. The people involved work as a team to achieve one goal. Each one helps and supports the other to succeed in their individual endeavors. They compliment each other and so they grow together and as individuals as well.
We Work Hard
Maintaining a good relationships is hard work. Many relationships break up because they change and stop making the efforts to keep the love alive. Each one works hard to make sure that the relationship they have will stay strong and alive.
We Trust
Trust is a vital ingredient to any relationship. It is like glass that needs to be protected because once it is broken it can never be fixed. If two people trust each other fully then they are fortunate to be in their relationship.
We Respect
Another important factor to having a good relationship is respect for one another. No matter how compatible two people are they will have their differences. Each one should not try to change the other, instead there should be acceptance and respect for one another. That is how a healthy union works.
We Have Love
Love is the ultimate sign of a good relationship. But I am not talking about romantic love alone. I am talking about selfless love that makes people give up important things in their life just to make the other one happy. I am talking about a love that is willing to sacrifice everything just so they can be with each other.

Tuesday, August 8, 2017

कैसे बनें एक अच्छे वक्ता ?

1) तैयारी करें 

2) ये सोचें कि आपको सफल होकर आना है :

3) श्रोताओं से जुड़ें :

4) भाषण बिना देखे बोलें :

5) Eye contact बनाये रखें :

6) रुचि की बात करिये : 

7) गलती हो जाने पर घबराएं नहीं :

9) प्रशंसा से दिल जीतें :

सीधी बिक्री ( डायरेक्ट मार्केटिंग) लाखों रुपये महीना कमाने का बिज़नेस ।

डायरेक्ट सेलिंग या मल्टीलेवल मार्केटिंग आज के युग में बढ़ती हुई इंडस्ट्री है ।आज आप किसी क्षेत्र में देख लो आपको कोई भी जॉब या कारोबार नहीं ...